UKPSC Important Economics Question Answer

Important Indian Economics Question Answer

नीति आयोग (Niti Ayog) : –

नीति आयोग (Niti Ayog) के गठन की घोषणा 15 aug 2014 को की गई थी जिसे 1 जनवरी 2015 को अस्तित्व में लाया गया था। यह आयोग नीति निर्माण व नीति निर्देशन (Policy formulation and Policy Direction) के थिंक टैंक के रूप में जोड़ा गया था जो केन्द्र व राज्य स्तर पर सरकारों को प्रासांगिक नीतियों व तकनीकी सलाह भी उपलब्ध कराता है यह आयोग केन्द्र व राज्य सरकारों के लिये नीति निर्माण (Policy Formulation) करने वाले संस्थान के रूप में कार्य करता है।

इसके संगठन में 5 प्रकार के घटकों /तत्वों (Components / Elements) को शामिल किया गया है जैसे : अध्यक्ष (President) ,उपाध्यक्ष (Vice President), 5 – पूर्णकालिक सदस्य (Full time member) ,2- अल्पकालिक सदस्य (Short term member) तथा 4- केन्द्रीय मन्त्रियों  (Cabinet Ministers)का समावेश होता हो इसके आलावा इसमें एक गवर्निंग परिषद् (Governing council), क्षेत्रीय परिषद् (Regional Council) व अतिथि विशेषज्ञों का भी प्रावधान(Provision) किया गया हो।

इसमें सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) पर विशेष बल दिया गया हो आयोग के द्धारा दीर्घ कलिक (15 वर्षीय ) , मध्य कलिक (7 – वर्षीय ) व 3 – वर्षीय लक्ष्य तय किये हो 15 – वर्षीय लक्ष्यों में गरीबी उन्मूलन ,स्वास्थ्य में सुधार व स्वच्छता जैसे ल;लक्ष्यों को रखा गया हो

आयोग द्धारा अपने वर्तमान 7 वर्षीय (2017 – 24 तक ) कार्यक्रमों में राष्ट्रीय विकास एजेण्डा के तहत आधारभूत ढाँचे को केन्द्रीय किया गया हो तथा 2017 – 20 के लिये एसेस फंडिंग रिक्वायरमेंट्स पर बल दिया गया हो

प्रश्न – 1 योजना आयोग व नीति आयोग में अन्तर बताइये  ?

                   योजना आयोग                                                नीति आयोग
·         नीति निर्माण में राज्यों का सीमित स्वरूप था

·         इसमें क्षेत्रीय परिषदों का कोई अस्तित्व नहीं था।

·         इसमें धन का निर्गमन राज्य के पास सीधे किया जाता था

·         इसमें केवल 5 -वर्षीय लक्ष्य तय किये जाते थे

 

·         नीति निर्माण में राज्यों को वृह्द व सक्रिय भूमिका होती है

·         इसमें क्षेत्रीय परिषदों को भी शामिल किया गया है

·         इसमें धन सलाहकारी बोर्ड के माध्यम से राज्यों के पास जाता है

·         जबकि इसमें 15 वर्षीय ,7 वर्षीय व  3 वर्षीय लक्ष्यों में तय किया जाता है।

 

भारत में श्रम सुधार (Labour Reform in india) : –

भारत में श्रम सुधारों के सम्बन्ध में प्रथम प्रयास 1961 में हुआ जब पहला श्रम आयोग बनाया गया। जिसमें श्रम संस्थाओं के पहलुओं के अध्ययन पर ध्यान केन्द्रित किया गया था।  द्वितीय आयोग जो की श्रम सुधारों से सम्बन्धित था का गठन रविन्द्र वर्मा की अध्यक्षता में किया गया था जिसके निम्न उद्देश्य थे जैसे : –

  • तत्कालीन श्रम कानूनों को युक्ति संगत बनाना।
  • असंगठित क्षेत्रों के कामगारों को काम देना।
  • वैश्वीकरण व नयी प्रौद्योगिकी के अनुसार श्रम में सुधार करना।

द्वितीय श्रम सुधार आयोग द्धारा निम्न सिफारिशों की गयी थी जैसे : –

  • श्रम संघो की बहुलता पर रोक लगाना।
  • धीरे काम करों ,नियमानुसार काम करों जैसे नियमों को कदाचार घोषित करना।
  • सार्वजानिक अवकाश कम करना
  • काम करने के घण्टे तय करना (प्रतिदिन 9 – घण्टे व सप्ताह में 4 , 5 घण्टे )
  • हड़ताल हेतु न्यूनतम 51 % कर्मचारियों की सहमति होनी चाहिए।
  • न्यूनतम मजदूरी तय करना।
  • श्रम कल्याण हेतु प्रावधान जैसे – मातृत्व लाभ ,वृद्धावस्था पेंशन ,सामाजिक सुरक्षा आदि।

असंगठित क्षेत्र (Unorganized Sector) :

असंगठित क्षेत्र से आशय ऐसे क्षेत्र से है जहाँ के लोगों हेतु किसी प्रकार की कोई सामाजिक सुरक्षा या दुर्घटना सुरक्षा उपलब्ध नहीं होती है अर्थात इनके कल्याण हेतु सरकारी कानूनों का आभाव होता है ऐसे क्षेत्रों के श्रमिक अपने हितों के प्रति बहुत कम जागरूक होते है यह भारत की जनसँख्या का लगभग 93 % है ऐसे क्षेत्रों के कल्याण हेतु 2 – उपाय है

विधिक उपाय (Legal remedy) :

जैसे :- कर्मचारी मुआवजा अधि ० 1923 ,बन्धुआ मजदूरी ,उन्मूलन अधि ० 1976 ,ठेका मजदूरी उन्मूलन अधि ० 1970 आदि।

कल्याणकारी योजनाए (Welfare Schemes) : – कोयला खानों के अतिरिक्त अन्य खानों के श्रमिकों व अन्य सीने कर्मियों हेतु कोष को स्थापना जिसका लाभ / उपयोग उनके बच्चों को शिक्षा ,मनोरंजन तथा चिकित्सा हेतु किया जायेगा।

राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण नीति  (National Mineral Exploration Policy (2015)) : –  इसके तहत भारत सरकार द्धारा निम्नलिखित प्रावधानों का समावेश किया गया है जैसे

  • इसके तहत सरकार द्धारा शत प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की अनुमति दी गयी हो जिसका उद्देश्य निजी क्षेत्र को खनिज अन्वेषण में भागीदार बनाना है।
  • खनिज क्षेत्रों का चुनाव E – नीलामी द्धारा होगा।
  • खनिज अन्वेषण में राज्यों की भूमिका तय होगी।
  • खनिज अन्वेषण करने वाली संस्थाओं की खनिज राजस्व में एक निश्चित भागीदारी होगी।
  • इस नीति के माध्यम से NCMT (National Center for Mineral Targetting ) की स्थापना की जायेगी जो अन्वेषण सम्बन्धी योजनाओं को उपलब्ध कराने हेतु शोध करेगा।
  • इस सबके लिये आधार – रेखा भू – वैज्ञानिक डाटा को नि : शुल्क उपलब्ध कराना होगा

भारत अभी अपनी भू -वैज्ञानिक क्षमता का केवल 10 % ही प्रयोग कर पा रहा था अतः इस क्षमता में वृद्धि करने हेतु राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण नीति 2016 को लाया गया था।

व्यापारी छूट दर  Merchant Discount Rate (MDR )  : – जब ग्राहक द्धारा क्रेडिट / डेबिट (credit debit) कार्ड के द्धारा किसी खुदरा व्यापारी  (Retailer) को भुगतान किया जाता है। तो यह बैंक द्धारा शुल्क योग्य माना जाता है इसका भुगतान सामन्यतः व्यापारी द्धारा ही किया जाता है।

नगदी रहित अर्थव्यवस्था में उसे एक बाधा के रूप में देखा  गया है जबकि बैंक का तर्क यह है की कार्ड जारी करने वाली कम्पनी को बैंक द्धारा भुगतान किया जाता है। इसके अतिरिक्त फंड का स्थानान्तरण बैंक द्धारा होने पर यह बैंक शुल्क योग्य है।

चन्द्रबाबु नायडु पेनल ने MDR को 5 % रखने का सुझाव दिया है जबकि वर्तमान में 1 % हो भारत में 24 अरब क्रेडिट कार्ड व 661 अरब डेबिट कार्ड प्रचलन में है ऐसे में ” डिजिटल भुगतान हेतु MDR को तर्क संगत बनाना आवश्यक है।

ग्रीन बॉन्ड (Green Bond) :

ग्रीन बॉन्ड (Green Bond) निवेशकर्ता के द्धारा उन्ही परियोजनाओ में निवेश किया जा सकता हो व्यवसायिक गतिविधियाँ पर्यावरण के अनुकूलन हो।  सामान्यतः इसके रिटर्न की  दर सामान्य बॉन्ड से क्म होती है सर्वप्रथम 2007 में विश्व बैंक व यूरोपीय बैंक द्धारा ग्रीन बॉन्ड जारी किये गये थे तथा भारत में प्रथम ग्रीन बॉन्ड YES बैंक के है

एक्जिम बैंक (Axim Bank) द्धारा जब 500 अरब डॉलर (Doller) के ग्रीन जारी किये गये तो उसे डॉलर ग्रीन बॉन्ड कहा गया / इसमें (SEBI) को नियामक संस्था (Regulatory body) बनाया गया हो|

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Posted by- Roopali Thapliyal

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